नई दिल्ली:
भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में सुधार को लेकर एक नया वैचारिक प्रस्ताव सामने आया है, जो राजनीति को जाति, धर्म और पहचान आधारित वोट बैंक से हटाकर योग्यता, पारदर्शिता और कार्य आधारित प्रणाली की ओर ले जाने की बात करता है। इस प्रस्ताव के अनुसार यदि राजनीतिक व्यवस्था में कुछ बुनियादी संरचनात्मक बदलाव किए जाएँ, तो चुनावी राजनीति का केंद्र नेताओं का प्रदर्शन, जवाबदेही और विकास कार्य बन सकता है।
इस प्रस्ताव में राजनीति में प्रवेश के लिए न्यूनतम शैक्षिक और कानूनी पात्रता सुनिश्चित करने की बात कही गई है। सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों के लिए कम से कम दसवीं या बारहवीं पास होना आवश्यक बताया गया है, जबकि आरक्षित वर्ग और महिलाओं के लिए न्यूनतम साक्षरता पर्याप्त मानी गई है ताकि सामाजिक समावेशन बना रहे।
प्रस्ताव का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है जनप्रतिनिधियों का रिपोर्ट कार्ड सिस्टम। इसके तहत हर सांसद और विधायक के काम, विकास कार्यों, निधि उपयोग और जनता के फीडबैक का सार्वजनिक मूल्यांकन किया जाएगा। यह रिपोर्ट कार्ड हर पांच वर्ष में अपडेट होगा और मतदाताओं को अपने प्रतिनिधि के काम का आकलन करने का अवसर देगा।
इसके अलावा प्रस्ताव में रोटेशन आधारित आरक्षण मॉडल भी सुझाया गया है, जिसके तहत समय-समय पर सीटों का आरक्षण बदलता रहेगा ताकि विभिन्न वर्गों को प्रतिनिधित्व का अवसर मिल सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस प्रकार की व्यवस्था लागू होती है तो चुनावों का आधार जाति या पहचान नहीं बल्कि विकास, पारदर्शिता और प्रशासनिक दक्षता बन सकता है। यह प्रस्ताव फिलहाल एक वैचारिक पहल के रूप में देखा जा रहा है, जिस पर भविष्य में व्यापक बहस संभव है।



